पाठ्यक्रम: GS3/जैव प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- कृषि उद्योग के वर्ष 2033 तक 2.5 गुना बढ़ने का अनुमान है। इस परिप्रेक्ष्य में जैव-प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों ने आगामी वर्षों में कृषि-जैव प्रौद्योगिकी के बढ़ते महत्व पर बल दिया है।
- वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि तापमान में प्रत्येक 1 डिग्री सेल्सियस वृद्धि से भारत की गेहूँ की उपज 6% से 10% तक घट सकती है।
जलवायु-लचीला कृषि (CRA) क्या है?
- जलवायु-लचीला कृषि जैव-प्रौद्योगिकी और पूरक तकनीकों का उपयोग कर खेती की पद्धतियों को दिशा देती है तथा रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करती है, साथ ही उत्पादकता को बनाए रखती है या बढ़ाती है।
- उपकरण: जैव-उर्वरक, जैव-कीटनाशक, मृदा-माइक्रोबायोम विश्लेषण।
- जीनोम-संपादित फसलें: सूखा, गर्मी, लवणीयता या कीट दबाव सहन करने वाली किस्में विकसित की जा सकती हैं।
- एआई आधारित विश्लेषण: पर्यावरणीय और कृषि संबंधी चर को एकीकृत कर स्थानीय स्तर पर उपयुक्त खेती रणनीतियाँ तैयार की जा सकती हैं।
भारत की जैव-अर्थव्यवस्था
- भारत विश्व में जैव-प्रौद्योगिकी के शीर्ष 12 गंतव्यों में शामिल है और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में तीसरे स्थान पर है।
- भारत की जैव-अर्थव्यवस्था 2014 में $10 बिलियन से बढ़कर 2024 में $165.7 बिलियन हो गई है।
- यह राष्ट्रीय GDP में 4.25% का योगदान करती है और विगत चार वर्षों में 17.9% की वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की है।
- भारत का जैव-प्रौद्योगिकी क्षेत्र चार श्रेणियों में विभाजित है: जैव-औषधि, जैव-कृषि, जैव-आईटी और जैव-सेवाएँ।
- भविष्य का लक्ष्य: 2030 तक $300 बिलियन की जैव-अर्थव्यवस्था प्राप्त करना और वैश्विक स्तर पर जैव-औषधि (वैक्सीन, डायग्नोस्टिक्स, थेरेप्यूटिक्स) में नेतृत्व करना।
भारत को CRA की आवश्यकता क्यों है?
- कृषि अर्थव्यवस्था: भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहाँ बढ़ती जनसंख्या के कारण अधिक और विश्वसनीय उत्पादन की आवश्यकता है।
- वर्षा-आधारित खेती: भारत के लगभग 51% शुद्ध बोए गए क्षेत्र वर्षा पर निर्भर हैं, जो देश के खाद्य उत्पादन का लगभग 40% प्रदान करते हैं। यह क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।
- पारंपरिक खेती की सीमाएँ: केवल पारंपरिक पद्धतियाँ जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दबावों का सामना करने में सक्षम नहीं हैं।
- अनुमानित गिरावट: सदी के अंत तक चावल जैसी मुख्य फसलों की उपज 3-22% तक घट सकती है, और सबसे खराब स्थिति में 30% से अधिक की गिरावट संभव है।
- उत्पादकता में वृद्धि: CRA तकनीकें उत्पादकता बढ़ाने के साथ पर्यावरणीय स्वास्थ्य की रक्षा करती हैं और खाद्य आयात पर निर्भरता कम करती हैं।
वैश्विक परिदृश्य
- अमेरिका: USDA जलवायु-अनुकूल कृषि और वानिकी (CSAF) पहल के माध्यम से CRA को संघीय नीति में शामिल किया गया है।
- यूरोपीय संघ: सीआरए को ईयू ग्रीन डील और फार्म टू फोर्क रणनीति में समाहित किया गया है।
- चीन: जलवायु-सहनशील फसल प्रजनन, बड़े पैमाने पर जल-बचत सिंचाई और कृषि डिजिटलाइजेशन पर केंद्रित।
- ब्राज़ील: EMBRAPA के जैव-प्रौद्योगिकी अनुसंधान द्वारा उष्णकटिबंधीय जलवायु-सहनशील फसलों के विकास में अग्रणी।
चुनौतियाँ
- कम अपनापन: छोटे और सीमांत किसानों में CRA तकनीकों का अपनापन कम है।
- असमान वितरण: जलवायु-लचीले बीजों का प्रसार धीमा है और जीन संपादन जैसी नई तकनीकों का वितरण राज्यों में असमान है।
- डिजिटल विभाजन: परिशुद्ध कृषि और एआई आधारित उपकरणों की पहुँच सीमित है।
- प्राकृतिक संसाधन संकट: मृदा क्षरण, जल संकट और बढ़ती जलवायु अस्थिरता वर्तमान प्रयासों से अधिक गति से बढ़ रही है।
- नीतिगत विखंडन: समन्वय की कमी प्रगति को धीमा कर सकती है।
कृषि में जैव-प्रौद्योगिकी का उपयोग
- जैव-प्रौद्योगिकी विभाग का कृषि जैव-प्रौद्योगिकी कार्यक्रम नवीन अनुसंधान को प्रोत्साहित करता है।
- मुख्य उपलब्धियों में शामिल हैं:

- जलवायु-स्मार्ट फसलें: सूखा-सहनशील उच्च उपज वाली चना किस्म “सात्विक (NC 9)” हाल ही में अधिसूचित की गई।
- जीनोम-संपादित फसलें: चावल की उत्पादकता को नियंत्रित करने वाले जीनों में परिवर्तन कर उपज बढ़ाई गई।
- अमरनाथ संसाधन: अमरनाथ जीनोमिक डेटाबेस, NIRS तकनीक और 64K SNP चिप विकसित की गई।
- फंगल बायोकंट्रोल: मायरोथीसियम वेरुकेरिया से विकसित स्थिर एंजाइम नैनो-फॉर्मुलेशन टमाटर और अंगूर में पाउडरी मिल्ड्यू के पर्यावरण-अनुकूल नियंत्रण हेतु।
सरकारी पहल
- राष्ट्रीय जलवायु-लचीला कृषि नवाचार: 2011 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने एक प्रमुख नेटवर्क परियोजना ‘राष्ट्रीय जलवायु-लचीला कृषि नवाचार’ की शुरुआत की।
- राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन: यह मिशन विशेष रूप से वर्षा-आधारित क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। इसका ध्यान एकीकृत खेती, जल उपयोग दक्षता, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और संसाधन संरक्षण के समन्वय पर केंद्रित है।
- BioE3 नीति: इस नीति ने जैव-प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों के विकास हेतु CRA (जलवायु-लचीली कृषि) को एक प्रमुख विषय क्षेत्र के रूप में स्थापित किया है।
- निजी क्षेत्र का योगदान: बायोस्टैड्ट, IFFCO, GSFC, NFL और IPL बायोलॉजिकल्स जैसी अग्रणी कंपनियाँ जैव-इनपुट उपलब्ध कराती हैं, जो मृदा स्वास्थ्य सुधारने और रासायनिक निर्भरता कम करने में सहायक हैं।
- डिजिटल कृषि क्षेत्र: भारत में डिजिटल कृषि क्षेत्र तीव्रता से विस्तार कर रहा है। एग्रीटेक स्टार्टअप्स एआई-सक्षम परामर्श, परिशुद्ध सिंचाई, फसल स्वास्थ्य निगरानी और उपज पूर्वानुमान उपकरण प्रदान कर रहे हैं।
आगे की राह
- जलवायु-सहनशील और जीनोम-संपादित फसलों के विकास और तैनाती को तीव्र करने की आवश्यकता है।
- किसानों को संक्रमण काल में सहयोग देने हेतु वित्तीय प्रोत्साहन, जलवायु बीमा और ऋण सुविधा आवश्यक है।
- भारत को BioE3 ढाँचे के अंतर्गत एक सुसंगत राष्ट्रीय CRA रोडमैप तैयार करना होगा, जो जैव-प्रौद्योगिकी, जलवायु अनुकूलन और नीतियों को एकीकृत कर बड़े पैमाने पर लचीलापन प्रदान कर सके।
स्रोत: TH
Previous article
भारतीय रिज़र्व बैंक के डिजिटल धोखाधड़ी को रोकने हेतु नए सुरक्षा उपाय
Next article
भारत की भुगतान क्रांति